Skip to content →

विश्वास

किसी भीषण
सूखे से आक्राँत
बँजर जमीन के सद्रिश्य
चटखता जा रहा है
मेरा ह्रिदय

काश
तुम घटा बनकर
मेरे जीवन मेँ आती
और
इस शुष्क ह्रिदय मेँ
यह विश्वास
पुनः जगा पाती
कि
बसंत आज भी
निहित है मुझमें ।

Published in Poetry

Comments

Reactions...

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.