शहर से सहर तक
युगों की डगर तक
जीवन की सफर से,
दुखों की कहर तक
प्रिये,
मैनें नहीं भूली तुम्हारी याद
जबकि तुम थे बेखबर मुझसे
कदाचित् हम दूर नहीं थे तुझसे।

लेकिन प्रिये,
इस सुनहली रेत पर,
चमकती धूप में भी
नहीं आ रही तुम्हारी छाया भी।
अन्धेरे ख्वाबों में,
यादों के आईने में,
नहीं दिखती तुम्हारी काया भी।
अकेलेपन के सिलसिले खत्म नहीं होते,
बहते हुये आँसू अब जब्त नहीं होते,
मुझे नहीं है तुमसे कोई शिकायत।

किन्तु मेरे प्रिये,
मेरे जीवन की रोशनी,
हूँ मैं तुम्हारे साथ सदैव,
कंपकंपाते तुषारों के तले,
सागर किनारे शांत क्षितिज के नीचे,
रेतीली गर्म हवा में जलते हुये भी
जेठ की दुपहरी में,
पतझड के शजरों के तले।