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ख्वाब

रात्रि की चौथी पहर में,
एक ख्वाब देखा है मैनें।
जिन्दगी कि किताब में जैसे,
बुझता हुआ चिराग देखा है मैनें।
अँधेरों की बारात अपने शवाब पर थीं,
खुशियों के जनाजे का सौगात देखा है मैनें।
प्रियजनों से बिछाव का दुःख नहीं था मुझको,
दोस्तों को अब सामने से करते हुए घात देखा है मैनें।

आँखें खुलीं तो खबर मिला स्वप्न था सब,
जानकर खुशी हुई कि झूठा ख्वाब देखा है मैनें।
उमँग की किरणें सामने आलिंगन कर रहीं थीं,
चारों ओर से होते प्रेम का बरसात देखा है मैनें।
ख्वाब के बाहर रौशन है शहरे-मुहब्बत,
बीते हुये बातों का औकात देखा है मैनें।

Published in Poetry

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