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सफर

जिन्दगी का सफर जब लंबा लगने लगे
पैरों के नीचे काँटों का बिस्तर चुभने लगे,
सूरज की किरणें जब अग्नि बरसाएँ
और रास्ते पर जब पत्थर नहीं पर्वत अडने लगे।

तब भी मुसाफिर हार नहीं मानना
क्योंकि रुकने का मतलब जीवन को रोकना है,
जिन्दगी तुझे हारने को नहीं दी गई
राही, तुझे मुस्कुराते हुये बस चलते ही जाना है।

इस सफर में सब तेरे सहयात्री हैं
पर तुझे इनसे कोई सरोकार नहीं,
तुम्हें इनके सहारे सफर नहीं तय करना है
और जिन्दगी कभी सहयात्रियों की मोहताज नहीं।

इनमें से कुछ तुम्हें भटकायेंगे
कुछ तुझे बातों मे अटकायेंगे,
कुछ तेरे सफर को आसान भी बनायेंगे
और जब तक जीवित रहें तेरा साथ निभायेंगे।

मँजिलें पहले बनाई जाती हैं
रास्ते बाद में मिलते जायेंगे,
जिन्दगी के सफर को तुझे खुद ही तय करना है
तो ये सहयात्री तुझे मँजिल तक कैसे पहुँचायेंगे।

तू सामने की दूरी से क्यों घबराता है
पीछे कितने मील के पत्थर छोड आया है तू,
जो बैठ गए उनकी बातों को क्यों सुनता है
मुडके देख, सुनकर कितनी बार पछताया है तू।

तुझे इस सफर में रूकना नहीं
बल्कि राह पर रोते हुओं कि हँसाना है,
और तुझे इस जिन्दगी को जीते हुए,
मुसाफिर बस चलते ही जाना है।

Published in Poetry

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