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आवाज

रात बीती, चलो भुला दें।

कौन अपना और कौन पराया
यह भेद आज मैं समझ न पाया,
पलकें खा गईं धोखा न जाने कैसे आज
दिल की खामोशियों को मैं परख न पाया।
इन खामोशियों को थोडी आवाज दिला दें,
रात बीती, चलो भुला दें।

सागर की लहरों को तुम तूफान समझ सकते हो
सुन चुका मैं, अब चला, ये मेरे प्यार की पुकार है,
गरज रही हुँकार सी बादल से मत भाग मेरे मन
ये मेरे दोस्त की मेरे लिए छेडी हुई मल्हार है।
ओछे शब्दों को थोडी सी जज्बात सिखा दें,
रात बीती, चलो भुला दें।

आशिकाना माहौल है, वक्त बेमिसाल है,
सारे किताबों में लिख देंगे हम कुछ नगमें,
कुछ यादों के, कुछ प्यार की, कुछ तेरे लिये, कुछ अपने तकरार की
तेरे सदके सब हैं कुर्बान, जमाना बस इससे है सहमे।
चल, जमाने को थोडी सी औकात दिखा दें,
रात बीती, चलो भुला दें।

Published in Poetry

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