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धुँध

मैं तन्हा था,
अकेला,
वीराने में करता रहा सफर।
उम्मीदों में भूला,
क्रँदन को तुला,
न छोडी थी मैंने कोई कसर,
और उसी रास्ते पे,
चला जा रहा था, अनवरत।

अचानक, परली तरफ से आती हुई,
बंजारन की तरह,
जैसे मेरी ही तलाश थी उसे,
मुझसे टकराई,
एक सुखद एहसास,
जैसे हो जीवन का एक तीखा-सा आभास।
गले लग गई बिना हाल पूछे,
भौंचक्क मैं देखता रह गया।
थोडी देर तक आँख मींचता रहा और,
“कहाँ थी अब तक?”
शिकायतों का अँबार,
बेताबी का गुबार।

“यहीं तो थी,
इस बार सर्दी थोडी लंबी पड गयी,
और तुम्हें याद नहीं?
तुम कुहरे में देख भी तो नहीं पाते!”

धुँध तो अब भी है,
जन्मों की तरह,
एक गूँज छेडी थी मैंने,
तुम्हारे लिये कई साल पहले,
अब तक तो सन्नाटे उसे निगल गये होंगे।
और तुम अब आई हो?
पता है,
कितनी बार मर चुका हूँ मैं अब तक?

वो मुस्कुराई,
थोडी सी दबी-हुई, टिमटिमाते पलकों के झुरमुट में,
फिर थोडे से फूल बरसे,
चमकती हुई दाँतों के भीतर से,
जैसे तरसी हुई थी अधरें बरसों से।
तरसा तो मैं भी था,
और मेरी तरस में झंकार भी थी,
पर शायद मोल नहीं था उसका।
थोडी ठँढक थी बाहर,
और भीतर भी,
मैंने उसके हाथ पकडे,
और पास पडे हुए बेंच की ओर बढ गया।

“तुम्हें तो आज भी जल्दी होगी जाने की?
इस बार मैं भी कहीं चला जाउँगा।”

“तुम तो शुरू से ही खानाबदोश रहे,
न तुम कहीं टिक सके, न तुम पर कोई टिक सका।
मुजरिम थे तुम,
भावनाओं के, संभावनाओं के,
ऐसे कोई जीता है भला!
एक मैं ही हूँ मूर्ख,
जो बार-बार तुमसे टकरा जाती हूँ।
तुम अब रास्तों को छोड क्यों नहीं देते?”

“तुम बदली नहीं अभी तक,
थोडी लम्हों जैसी, थोडी सपनों जैसी,
और ये रास्ते,
ये रास्ते ही तो मेरी जिन्दगी हैं।
जब तक जिन्दा हूँ, शायद चलता रहूँगा,
हर साल सर्दियों में तुमसे मिलता रहूँगा।
ये कोहरे,
ये अक्सर तुम्हारी याद दिलाती हैं।
हर धुँध में, मैं ढूँढूँगा तुम्हे,
उन लतरों के पीछे, और हमारे दर्दों के नीचे,
तडपा करूँगा, और ढूँढता रहूँगा।
जानता हूँ कि मेरी किस्मत में सरफरोशी लिखी है,
और तुममें बेवफाई।
तुमपर तो बँदिशें भी थीं और मैं आवारा था,
और आखिर मैंने ही तो इन सपनों को सँवारा था,
और एक एहसान था तेरा,
उनको संभाल के रखने का।
मुझे याद है तुम्हारी वो चपतें और वो गुस्सा,
जब मैं सिगरेट पिया करता था।
आज पूर्णविराम क्यों नहीं लगा देतीं,
मेरे जीवन पर,
आज तो मैं सबसे बडा पाप कर रहा हूँ।
दे दो सजा, या फिर आ जाओ मेरे पास,
या तो खत्म कर दूँ ये सफर, या फिर अधूरा क्यों रहूँ,
और क्यूँ रहूँ मैं इन रास्तों पर भटकते हुए…

“मेरे जाने का समय हो गया,
मैं चलती हूँ अब।
तुम अपना ख्याल रखना।”
उसने उठकर गले लगाया
और झट से दौडती हुई कोहरे में गुम हो गयी।

“तुम मुझे कभी सुनती ही नहीं!”
एक शुष्क आह ली, कॉलर सीधे किये,
और बढ गया मैं फिर,
उन्हीं तन्हा राहों पर,
अकेला,
धुँध से लडता हुआ।

Published in Poetry

6 Comments

  1. beautiful…..vivid too….cud visualize everything….keep it up..

  2. Sameer Pandey Sameer Pandey

    Bahut acche bhai.. Bahut Dard Hai isme … Keep going…

  3. I don’t have a profound understanding of Hindi but I reckon this is a nice poem. Very soulful. Keep up the good work and drop by — at my web-space — sometime.

  4. Pankaj Pandey Pankaj Pandey

    achchi kavita hai!!! shabdo ko sahi se piroya gaya hai bhavnao ki maala me….

  5. Jitni baar ye poem read karti hoon utni baar aur mann karta hai read karne ko…I can read this innumerous times…and everytime I find a new aspect in this……u rock……

  6. Bhawna Bhawna

    “तुम तो शुरू से ही खानाबदोश रहे,
    न तुम कहीं टिक सके, न तुम पर कोई टिक सका।

    Perfectly suits you 🙂

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