नीले क्षितिज के तट पर
उन्मत पक्षियों की
स्वछन्द उडानों को देखकर अक्सर सोचता हूँ
कि सागर के गहरे पानी में
खोती हुई लहरें
क्या विलीन होने के लिये ही
इतने ऊँचे छलाँग भरती हैं।

सत्य से अटल खडे हुए
जिद्दी उजले पहाडों से उत्तर माँगता हूँ
कि इतने उतीर्ण होते हुए भी
हार क्यों मान गया तू
दूर सोये हुये आकाश से।

अन्धेरी रातों में
चमकते सितारों एवँ बदलते चाँद से
अभी भी मैं पूछता हूँ
वे इतने बहादुर क्यों नहीं
कि एक सूरज के सामने क्षण भर टिक सकें।

और जमीन पर मृत्योन्मुख लोगों ने
अब तक मुझे जवाब नहीं दिया
कि प्रेम की बगिया में
समय का पतझड
दुःखों कि आँधी क्यों लाता है?
क्या उनका विश्वास इतना भी अटल नहीं
कि वे पू्र्ववत चमकते रहें।
जैसे सूरज को कभी कोई फर्क नहीं पडता
जबकि कितने ग्रहणों का मार झेला है उसने।