ऐसी शिरकत की इस मजमे में कि,
सदियाँ बीत गयीं चराग-ए-इश्क बुझाने में,
ऐसा सैलाब उमडा तकदीर का,
कि कोई बता न सका कितनी देर लगेगी उसको आने में,

अब तो रूह तडपती है बेहिसाब, कि चैन नहीं आता।।