कैसी राह चल पडे हम कि नींद भी ना ख्वाबों में,
सप्तऋषि और इँदृधनुष भी आ गये मेरी राहों में।

सात समँदर के तटों पर ऐसा रथ है मैनें देखा,
सात रँगों से बुना था बादलों पे ऐसी रेखा;
सात ऋषियों के गुणों से तर बतर मेरा है नभ,
जाने कैसा भाग्य है और कैसी मेरी देखो लेखा।
सात सुर की गूँज छेडी और भागता देखा जहाँ,
आज नभ में आँधी आई और झूम नाचे सब यहाँ;
जिस्म ने है सर उठाई, दिल ने है अब पग बढाये,
आज रक्तरंजित होगी भूतों की टोली कहाँ।
कैसी मंजिल पे बढा मैं, कैसे सपने ये गढा मैं,
किस दिशा लूं अँगडाई, या चल रहूँ मैं ख्वाबों में।।

नाश-नश्तर कील-पत्थर, तोडता मेरा तूफान,
तितलियाँ और रंगवलियाँ, चूमते मेरा निशान;
ये विराट कर्म कब है धर्म की डोली चढा,
सदियों में जो ना हुआ, अब क्या हो मुझको पता।
मौन पर्वत की कसम, मदमस्त होके लौटूँगा,
अन्यथा मेरी चिता पर सूर्य अग्नि पोतेगा;
सिंदूरी है माँ का सर और सिंदूरी मेरा कफन,
गर रस फुहारें लेके लौटूँ, तो होगा यहाँ जशन।
ऐसे वादों के लिये, अब क्या चिता और क्या कफन,
अब तो चाहे हो प्रलय, ना सोऊँगा इन ख्वाबों में।।

पृथ्वी के है गर्भ अग्नि, था ये मैनें जब सुना,
उस पल से इस स्वप्न को, रहगुजर ने था चुना;
अपने धर्म को मारकर, मेरे कर्म ने किया हुँकार,
मैं फिर मरा, पर जी पडा, ऐसा जीवन किसने बुना।
कौन खींचता मेरा रथ, और किसकी है ये पुकार,
किस मायावी ने मत्थे टेके, सुनकर मेरा ललकार;
किसकी गालों पे लाली चमकी, किसका सर ऊँचा उठा,
किसकी करनी, कौन जीता, और मैंने छेडा मल्हार।
कौन रोके कौन टोके, कौन चौंके इस रहगुजर से,
कौन मेरे रथ पे बैठे, मेरे साथ मेरे ख्वाबों में।।