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पहचान

मातम-ए-जन्नत में मेरी शान यही है,
कैसे कहूँ अब मेरी पहचान यही है।

सिसक पडते आँसू और सींझ जाते हाथ
भरते हुये जख्मों से क्यूँ बिखरे जज़्बात,
झाँकते होंठ रो पडे जब देखे हमने टूटते
अपने ही लम्हों से बुने हुये कुछ बात,
जिन्दा लाशों में अब क्यूँ जान नहीं है,
कैसे कहूँ अब मेरी पहचान यही है।

जानलेवा रेत है और सूखे हुये सागर
अब उस चरवाहिन के भरते नहीं गागर,
चिलचिलाती धूप जब, है बिलबिलाती भूख
आदमी की लाशों पे, मरते क्यूँ हैं डाँगर,
इस गाँव में अब आते मेहमान नहीं हैं,
कैसे कहूँ अब मेरी पहचान यही है।

हर शहर में काम की है ऐसी हवा भागी
फैक्ट्री में बच्चों की पीठ क्यों गयी दागी,
स्त्री का जिस्म पहने कफन तो भी नग्न
ऐ युवा, है तुझमें कैसी प्रेम-अगन लागी,
आज जन्मे बच्चे भी नादान नहीं हैं,
कैसे कहूँ अब मेरी पहचान यही है।

राम की गद्दी पे शैतान नजर आये
बुढिया को पीटते उसके ही जने साये,
आदमीयत के चर्चे किताबों में पढें बच्चे
रिश्तों की तकदीर को तो नाटकों में पाये,
कैसे फोडूँ घाव, कब्रिस्तान नहीं है,
कैसे कहूँ अब मेरी पहचान यही है।

होती हैं कुछ यादें ताजा, अनसुनी व अनकही
कौन बोले, पूछ दूँ जब क्या गलत था क्या सही,
मैनें ली जब मौनव्रत, तो चीखती है मेरी बहना
घर में ही जब डोली उठनी, जार देते तुम यहीं,
कौन कहता है सफर नाकाम नहीं है,
कैसे कहूँ अब मेरी पहचान यही है।

Published in Poetry

2 Comments

  1. Nishant Nishant

    Very beautifully laid expressions!! Awesome!! I have no words to express my feelings here. You have touched all the pain that Indians are going through. Seems the start of another revolution the youth is gonna start and you gonna lead that buddy. Keep it up!! U leave me impressed everytime and inspire me all the more. 🙂

  2. Sameer Pandey Sameer Pandey

    Bahut acche bandhu .. hakikat ko aahce tareeke se ujagar kiya hai aapne kalam dwara ..

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