गिरने और संभलने की रवायत चली ऎसी,
सफर आसाँ भी था तो मुश्किल बना डाला।
(मेरा गीत)
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आज मेरा घर कहकहों से गूँज रहा था,
दिल के दर्द को छुपाना कोई हमसे सीख ले।
(कोई पहचान सका क्या?)
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“मुझे छोड के सफर में सो रहे हो तुम?”
मेरी कब्र के सिरहाने कोई गा रहा था कल।
(मजबूरः तब भी, अब भी)
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मैं तो बंजारा हूँ, ना टिका ना रुक सका कभी,
दो पल साथ जी लो, फिर खुद चला जाउँगा।
(एक गुजारिश)
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रिश्तों की गर्दिश में तसव्वुर ढूँढते लोग,
दिल की गलियों में अपना गिरेबान झाँकते हैं।
(रिश्तों के पहरुओं की सच्चाई)
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दो अश्क गिराये हैं देखो मेरी कब्र बनाके,
झूठी कसमों से हाय एक रस्म निभा दिया।
(रिश्तों पे सच की चोट)
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आवारा हो तुम, तुम्हें रिश्तों की समझ क्या,
एक अनाथ की हैसियत से खेलती दुनिया।
(किसे रिश्ता निभाना आता है?)
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जहन्नुम के नस्ल की अदाकारी का शौकीन,
अपना कोठा जला संसद में सो रहा देखो।
(देश की राजनीति पर)
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इस शाम शायद फिर से भूल हुई थी,
मेरे शाँत क्षितिज पे फिर धूल उडी थी;
आज चौबीस साल बाद तेरी याद आयी,
उसी समँदर किनारे देखो भाग आयी।
(मेरी जिंदगी का गीत मेरे लिये)
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मुझे इश्क ना था तो पागल कहा तुमने,
कहीं दिल आ गया तो कातिल बना डालोगे।
(थोडा सा रुमानी हो जाये)
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एक जमाने से हँसते हुये ये गा रहा था गीत,
उदास गलियों से गुजरे हुये बरसों गुजर गये।
(बस, हँसता रहूँगा)
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