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पुकार

बाबूजी हमें भोंको ना सुईया मछरिया,
बाबूजी हमें रोको न आठों पहरिया.

जनम हैं छूटे यहाँ, छूटे शहर हैं,
छूटी जईहें अब बाबुल की दुअरिया.

नज़र पड़ेगी मईया जब जब डगर पे,
नाहीं अइबो तोहे हम नजरिया.

भैया बुलईबो, बुलईबो बाबूजी तोके,
बाकी हम जानत, ना अइहें लितहरिया.

सोने की पिंजरा, जतन से भेजत हो,
हमका ना चाहीं चांदी की सिकरिया.

लईकन में मजली, जवनिया बहरात बा,
अब घीसी जईबे अंगनवा ससुरारिया.

अजगर के धोती आऊरी बादुर के टोपी,
हमरो देता तू एगो नैका चाकर चदरिया।

नईहर छोड़ाई दिए, देबो ना गारी,
काहे छिनलु तु हमरे सब अधिकारिया.

माई कहलू जईसन, नीके रहली हम,
मिलबो हो गईल अब काहे दुस्वरिया.

ससुरा अढावत रहे, सासू मारे ताना,
पियो मिलवलु तु गजबे बहुरुपिया.

कईसे बताएं इहाँ, का का होखत है,
का होइल जाके पूछिहा चौकिदारिया.

अभियो बकत बाटे, जे होई से होई,
एतना अलगे मत करs कि हो जा तु दफतरिया.

बाबूजी हमें भोंको ना सुईया मछरिया,
बाबूजी हमें रोको न आठों पहरिया.

 

Image Source : Bharat Matrimonial

Published in Poetry

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