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{ 15-Jan-2008 }
‘इस धुँध की महक
कितनी सोंधी होती है ना!’
उस रात घने कोहरे में
साथ चलते-चलते तुमने कहा था.
स्ट्रीटलाईट की पीली रौशनी में,
तुमने मेरे कंधे पे हाथ रखकर जोर की एक साँस ली थी
और तुम्हारा चेहरा चमक गया था.
तुम्हारे बदन की तपिश
और किनारे खड़े लिप्टस की पत्तियों से
गिरते हुए ओस में
एक सोंधी सी,
भीनी-भीनी खुशबू का मुझे भी एहसास हुआ था.
मैंने जब तुम्हारी और देखा
तो शायद तुमने कहा था
‘मुझे तो इसी धुँध में अपनी ज़िंदगी गुजारनी है’
उस वक़्त मेरा ध्यान
तुम्हारे सिर के ऊपर से झाँक रहे चाँद की तरफ़ था.
वो चाँद तो मुझे अब याद नहीं
पर उस दिन से आज तक
मैं उसी धुँध में जी रहा हूँ.
याद है, जब मैं तुम्हे शिफौन पहनने को कहा करता था,
तुम शरमा के लाल हो जाती
और चुपके से हँसते हुए,
मेरे कंधे पर चेहरा छुपाकर मेरा गरदन चूम लेती थी.
आज जब भी मुझे
आलमीरे में वो शिफौन नज़र आता है,
मेरे कंधे पे एक आहट होती है
और वही, उस रात वाली,
सोंधी सी महक.
पीछे मुड़कर देखता हूँ तो कुछ भी नज़र नहीं आता.
वो कोहरा आज भी
मेरे गिर्द
ज़र्द होकर पड़ा है.
एक दिन तुमने
पागलों की तरह मुझे खींच कर
अपने जिस्म के आलिंगन में बाँध लिया था.
याद है, उस दिन
मेरे हाथों को अपने बदन से लिपटा पाकर
तुम्हारा जिस्म थर-थर काँपने लगा था,
मेरे पीठ सहलाने पर तुम तो धीरे-धीरे शांत हो गई थी,
लेकिन मेरा अस्तित्व
आज तक वैसे ही काँप रहा है,
वो तूफान कभी थमने का नाम ही नहीं लेता.
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने अपने स्वेटर को तेरी खुशबू से लबरेज़ पाया था,
वो मेरे आलमीरे में अब तक पड़ा है.
इस शहर में अब धुँध नहीं होती,
सिर्फ़ धुआँ दिखता है.
आज जब भी अपने होंठों पे हाथ फिराता हूँ,
तुम्हारा एहसास वहीं का वहीं पाता हूँ
और आईने में ख़ुद को हिलता नज़र आता हूँ.
रोज़ रात को जब तुम्हारी याद आती है,
मैं उठकर आलमीरा खोल देता हूँ,
जिस तरह मैं तुम्हारे लिए अपने घर का दरवाजा खोला करता था,
वो सोंधी से महक अब भी वहीं लेटी है.
और वो कुहरा,
मेरे बिस्तर में रात भर पैर समेटे सोता रहता है.
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{ 18-Dec-2007 }
रिश्तों की तकसीम से
बनी दीवारों से आहत
इक शख्स ने टोका यूँ हीं.
मैं तीरगी में कुछ ढूँढ रहा था,
और कुछ शिकायत थी उनको,
वो अटक रहे थे,
मैं भटक रहा था.
उनकी पेशवा आंखें,
ठहरी बदहवास साँसे,
क्षुब्ध चेहरे से कुछ लम्हें धीरे से खाँसें -
क्या खोजते हो इस जहाँ में,
बिना छ्त के इस मकाँ में?
बुने थे कुछ चेहरे, चुने थे कुछ रिश्ते,
फ़िर फरिश्तों की ईंट से था घर इक बनाया.
चेहरे मुँह बाये खड़े रहे,
दीवार छ्त को खा गए,
आंखें स्तब्ध, ज़ुबाँ खामोश, न जाने कैसे ये मंजर आया.
मेरे लफ़्ज़ों से फूटे
चंद जुम्ले मुतबस्सुम-
बहते बादलों से जन्मे
एक बूँद ही हैं हम तुम.
सावन, आषाढ़, या सर्दी की हो लहरें,
झील, झरने, या नदी में हम ठहरें,
तेरे टूटे हुए छ्त या टपकें हरे दूब पे,
मुख्तलिफ परिभाषाएं, पर बूँद ही हैं हम तुम.
मिटटी के घर की छतों से बने शहरें,
या हो फ़िर देशों की सीमाओं पे पहरें,
घर की कमरों में क़ैद हवा
या तो सड़ जायेगी
या फ़िर छ्त तोडके उड़ जायेगी.
मुख्तलिफ रिश्ते, दोस्ती, नाते, वास्ते,
अलग-अलग कमरों जैसे
छ्त खोजते हुए दीवारों से जकडे राब्ते.
जितने बड़े रिश्ते, उतनी बड़ी जंजीरें,
जितनी चौडी दोस्ती, उतनी बंद कुशादगी.
और टूटी हुई छ्त
अट्टहास लगाती, याद दिलाती -
आकाश है प्रेम
जो खुले कायनात में पलता है,
हवा की दीवारों
और दूब की धरती में ही
सतरंगी खुशबू से नीला छ्त ढलता है.
तेरे बनाये घर से दबी है कायनात
सिसकती सदायें और बिखरे हयात,
बिला खौफो-खतर ये सफर छोड़ दो
बिना छ्त की बनी हर घर तोड़ दो,
खोज सच की है तो आओ दरवेश चलें
चरगे-इश्क दिल में जला गृहप्रवेश करें.
शब्दकोश:
तकसीम-बंटवारा, तीरगी-अँधेरा, पेशवा- ज्ञानी, मंजर-दृश्य, मुतबस्सुम-मुस्कुराते हुए, मुख्तलिफ-भिन्न-भिन्न, तरह तरह के, कुशादगी-खुलापन, कायनात-धरती, सदायें-आवाजें, हयात-जीवन, बिला खौफो-खतर -भय और दुःख के बिना, दरवेश-पवित्र स्थल.
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{ 15-Sept-2007 }
It was yesterday,
when it all came to me.
All random, scattered,
swollen and trembling
gratitudes of mine go to thee.
Early dawn,
and some dripple dews
on yellowish maple leaves.
All afresh, but ebbing away,
and continuously playing on my heaves.
Amidst the beauty
the sleep was still on my nerves.
Two eyes were reading newspapers
and the heart
was stumbling on the curves.
Some killings, a couple of rapes,
shining knives with the people of plague.
Also some riots on the name of god
and a wife with broken spinal cord.
Hardly interesting it was making me bored,
it was all as usual to be surely ignored.
For the “ignorance is bliss”
and daily holocaust
by the people with the blessings of lord.
The sovereign almighty
had to celebrate the night
coz the mutants are to kill
and the mutants are to die.
For the god,
who is hidden in milky way.
I would appreciate
murders, riots, rapes,
and an earth full of fray.
Err, I always admired
the existence of thy gods.
And all their children -
dews, leaves, birds,
and the manlike swords.
With the rising morning
I saw end of the dawn,
and the falling dews just like me.
The power belongs to the god
and the things mutants do for thee.
We exist for a reason
to be thankful of a dying distant dynasty.
As the kingdom told me yesterday:
we are here to be ignored
and we are here to ignore.

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पहचान
{ 30-May-2007 }
मातम-ए-जन्नत में मेरी शान यही है,
कैसे कहूँ अब मेरी पहचान यही है।
सिसक पडते आँसू और सींझ जाते हाथ
भरते हुये जख्मों से क्यूँ बिखरे जज़्बात,
झाँकते होंठ रो पडे जब देखे हमने टूटते
अपने ही लम्हों से बुने हुये कुछ बात,
जिन्दा लाशों में अब क्यूँ जान नहीं है,
कैसे कहूँ अब मेरी पहचान यही है।
जानलेवा रेत है और सूखे हुये सागर
अब उस चरवाहिन के भरते नहीं गागर,
चिलचिलाती धूप जब, है बिलबिलाती भूख
आदमी की लाशों पे, मरते क्यूँ हैं डाँगर,
इस गाँव में अब आते मेहमान नहीं हैं,
कैसे कहूँ अब मेरी पहचान यही है।
हर शहर में काम की है ऐसी हवा भागी
फैक्ट्री में बच्चों की पीठ क्यों गयी दागी,
स्त्री का जिस्म पहने कफन तो भी नग्न
ऐ युवा, है तुझमें कैसी प्रेम-अगन लागी,
आज जन्मे बच्चे भी नादान नहीं हैं,
कैसे कहूँ अब मेरी पहचान यही है।
राम की गद्दी पे शैतान नजर आये
बुढिया को पीटते उसके ही जने साये,
आदमीयत के चर्चे किताबों में पढें बच्चे
रिश्तों की तकदीर को तो नाटकों में पाये,
कैसे फोडूँ घाव, कब्रिस्तान नहीं है,
कैसे कहूँ अब मेरी पहचान यही है।
होती हैं कुछ यादें ताजा, अनसुनी व अनकही
कौन बोले, पूछ दूँ जब क्या गलत था क्या सही,
मैनें ली जब मौनव्रत, तो चीखती है मेरी बहना
घर में ही जब डोली उठनी, जार देते तुम यहीं,
कौन कहता है सफर नाकाम नहीं है,
कैसे कहूँ अब मेरी पहचान यही है।
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{ 13-April-2007}
गिरने और संभलने की रवायत चली ऎसी,
सफर आसाँ भी था तो मुश्किल बना डाला।
(मेरा गीत)
……..
आज मेरा घर कहकहों से गूँज रहा था,
दिल के दर्द को छुपाना कोई हमसे सीख ले।
(कोई पहचान सका क्या?)
……..
“मुझे छोड के सफर में सो रहे हो तुम?”
मेरी कब्र के सिरहाने कोई गा रहा था कल।
(मजबूरः तब भी, अब भी)
…….
मैं तो बंजारा हूँ, ना टिका ना रुक सका कभी,
दो पल साथ जी लो, फिर खुद चला जाउँगा।
(एक गुजारिश)
…….
रिश्तों की गर्दिश में तसव्वुर ढूँढते लोग,
दिल की गलियों में अपना गिरेबान झाँकते हैं।
(रिश्तों के पहरुओं की सच्चाई)
…….
दो अश्क गिराये हैं देखो मेरी कब्र बनाके,
झूठी कसमों से हाय एक रस्म निभा दिया।
(रिश्तों पे सच की चोट)
…….
आवारा हो तुम, तुम्हें रिश्तों की समझ क्या,
एक अनाथ की हैसियत से खेलती दुनिया।
(किसे रिश्ता निभाना आता है?)
…….
जहन्नुम के नस्ल की अदाकारी का शौकीन,
अपना कोठा जला संसद में सो रहा देखो।
(देश की राजनीति पर)
…….
इस शाम शायद फिर से भूल हुई थी,
मेरे शाँत क्षितिज पे फिर धूल उडी थी;
आज चौबीस साल बाद तेरी याद आयी,
उसी समँदर किनारे देखो भाग आयी।
(मेरी जिंदगी का गीत मेरे लिये)
…….
मुझे इश्क ना था तो पागल कहा तुमने,
कहीं दिल आ गया तो कातिल बना डालोगे।
(थोडा सा रुमानी हो जाये)
…….
एक जमाने से हँसते हुये ये गा रहा था गीत,
उदास गलियों से गुजरे हुये बरसों गुजर गये।
(बस, हँसता रहूँगा)
…….
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{ 13-Mar-2007 }
कैसी राह चल पडे हम कि नींद भी ना ख्वाबों में,
सप्तऋषि और इँदृधनुष भी आ गये मेरी राहों में।
सात समँदर के तटों पर ऐसा रथ है मैनें देखा,
सात रँगों से बुना था बादलों पे ऐसी रेखा;
सात ऋषियों के गुणों से तर बतर मेरा है नभ,
जाने कैसा भाग्य है और कैसी मेरी देखो लेखा।
सात सुर की गूँज छेडी और भागता देखा जहाँ,
आज नभ में आँधी आई और झूम नाचे सब यहाँ;
जिस्म ने है सर उठाई, दिल ने है अब पग बढाये,
आज रक्तरंजित होगी भूतों की टोली कहाँ।
कैसी मंजिल पे बढा मैं, कैसे सपने ये गढा मैं,
किस दिशा लूं अँगडाई, या चल रहूँ मैं ख्वाबों में।।
नाश-नश्तर कील-पत्थर, तोडता मेरा तूफान,
तितलियाँ और रंगवलियाँ, चूमते मेरा निशान;
ये विराट कर्म कब है धर्म की डोली चढा,
सदियों में जो ना हुआ, अब क्या हो मुझको पता।
मौन पर्वत की कसम, मदमस्त होके लौटूँगा,
अन्यथा मेरी चिता पर सूर्य अग्नि पोतेगा;
सिंदूरी है माँ का सर और सिंदूरी मेरा कफन,
गर रस फुहारें लेके लौटूँ, तो होगा यहाँ जशन।
ऐसे वादों के लिये, अब क्या चिता और क्या कफन,
अब तो चाहे हो प्रलय, ना सोऊँगा इन ख्वाबों में।।
पृथ्वी के है गर्भ अग्नि, था ये मैनें जब सुना,
उस पल से इस स्वप्न को, रहगुजर ने था चुना;
अपने धर्म को मारकर, मेरे कर्म ने किया हुँकार,
मैं फिर मरा, पर जी पडा, ऐसा जीवन किसने बुना।
कौन खींचता मेरा रथ, और किसकी है ये पुकार,
किस मायावी ने मत्थे टेके, सुनकर मेरा ललकार;
किसकी गालों पे लाली चमकी, किसका सर ऊँचा उठा,
किसकी करनी, कौन जीता, और मैंने छेडा मल्हार।
कौन रोके कौन टोके, कौन चौंके इस रहगुजर से,
कौन मेरे रथ पे बैठे, मेरे साथ मेरे ख्वाबों में।।
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{ 11-Dec-2006 }
मैं तन्हा था,
अकेला,
वीराने में करता रहा सफर।
उम्मीदों में भूला,
क्रँदन को तुला,
न छोडी थी मैंने कोई कसर,
और उसी रास्ते पे,
चला जा रहा था, अनवरत।
अचानक, परली तरफ से आती हुई,
बंजारन की तरह,
जैसे मेरी ही तलाश थी उसे,
मुझसे टकराई,
एक सुखद एहसास,
जैसे हो जीवन का एक तीखा-सा आभास।
गले लग गई बिना हाल पूछे,
भौंचक्क मैं देखता रह गया।
थोडी देर तक आँख मींचता रहा और,
“कहाँ थी अब तक?”
शिकायतों का अँबार,
बेताबी का गुबार।
“यहीं तो थी,
इस बार सर्दी थोडी लंबी पड गयी,
और तुम्हें याद नहीं?
तुम कुहरे में देख भी तो नहीं पाते!”
धुँध तो अब भी है,
जन्मों की तरह,
एक गूँज छेडी थी मैंने,
तुम्हारे लिये कई साल पहले,
अब तक तो सन्नाटे उसे निगल गये होंगे।
और तुम अब आई हो?
पता है,
कितनी बार मर चुका हूँ मैं अब तक?
वो मुस्कुराई,
थोडी सी दबी-हुई, टिमटिमाते पलकों के झुरमुट में,
फिर थोडे से फूल बरसे,
चमकती हुई दाँतों के भीतर से,
जैसे तरसी हुई थी अधरें बरसों से।
तरसा तो मैं भी था,
और मेरी तरस में झंकार भी थी,
पर शायद मोल नहीं था उसका।
थोडी ठँढक थी बाहर,
और भीतर भी,
मैंने उसके हाथ पकडे,
और पास पडे हुए बेंच की ओर बढ गया।
“तुम्हें तो आज भी जल्दी होगी जाने की?
इस बार मैं भी कहीं चला जाउँगा।”
“तुम तो शुरू से ही खानाबदोश रहे,
न तुम कहीं टिक सके, न तुम पर कोई टिक सका।
मुजरिम थे तुम,
भावनाओं के, संभावनाओं के,
ऐसे कोई जीता है भला!
एक मैं ही हूँ मूर्ख,
जो बार-बार तुमसे टकरा जाती हूँ।
तुम अब रास्तों को छोड क्यों नहीं देते?”
“तुम बदली नहीं अभी तक,
थोडी लम्हों जैसी, थोडी सपनों जैसी,
और ये रास्ते,
ये रास्ते ही तो मेरी जिन्दगी हैं।
जब तक जिन्दा हूँ, शायद चलता रहूँगा,
हर साल सर्दियों में तुमसे मिलता रहूँगा।
ये कोहरे,
ये अक्सर तुम्हारी याद दिलाती हैं।
हर धुँध में, मैं ढूँढूँगा तुम्हे,
उन लतरों के पीछे, और हमारे दर्दों के नीचे,
तडपा करूँगा, और ढूँढता रहूँगा।
जानता हूँ कि मेरी किस्मत में सरफरोशी लिखी है,
और तुममें बेवफाई।
तुमपर तो बँदिशें भी थीं और मैं आवारा था,
और आखिर मैंने ही तो इन सपनों को सँवारा था,
और एक एहसान था तेरा,
उनको संभाल के रखने का।
मुझे याद है तुम्हारी वो चपतें और वो गुस्सा,
जब मैं सिगरेट पिया करता था।
आज पूर्णविराम क्यों नहीं लगा देतीं,
मेरे जीवन पर,
आज तो मैं सबसे बडा पाप कर रहा हूँ।
दे दो सजा, या फिर आ जाओ मेरे पास,
या तो खत्म कर दूँ ये सफर, या फिर अधूरा क्यों रहूँ,
और क्यूँ रहूँ मैं इन रास्तों पर भटकते हुए॰॰॰॰॰
“मेरे जाने का समय हो गया,
मैं चलती हूँ अब।
तुम अपना ख्याल रखना।”
उसने उठकर गले लगाया
और झट से दौडती हुई कोहरे में गुम हो गयी।
“तुम मुझे कभी सुनती ही नहीं!”
एक शुष्क आह ली, कॉलर सीधे किये,
और बढ गया मैं फिर,
उन्हीं तन्हा राहों पर,
अकेला,
धुँध से लडता हुआ।
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{ 16-Sep-2003 }
नीले क्षितिज के तट पर
उन्मत पक्षियों की
स्वछन्द उडानों को देखकर अक्सर सोचता हूँ
कि सागर के गहरे पानी में
खोती हुई लहरें
क्या विलीन होने के लिये ही
इतने ऊँचे छलाँग भरती हैं।
सत्य से अटल खडे हुए
जिद्दी उजले पहाडों से उत्तर माँगता हूँ
कि इतने उतीर्ण होते हुए भी
हार क्यों मान गया तू
दूर सोये हुये आकाश से।
अन्धेरी रातों में
चमकते सितारों एवँ बदलते चाँद से
अभी भी मैं पूछता हूँ
वे इतने बहादुर क्यों नहीं
कि एक सूरज के सामने क्षण भर टिक सकें।
और जमीन पर मृत्योन्मुख लोगों ने
अब तक मुझे जवाब नहीं दिया
कि प्रेम की बगिया में
समय का पतझड
दुःखों कि आँधी क्यों लाता है?
क्या उनका विश्वास इतना भी अटल नहीं
कि वे पू्र्ववत चमकते रहें।
जैसे सूरज को कभी कोई फर्क नहीं पडता
जबकि कितने ग्रहणों का मार झेला है उसने।
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{ 13-July-2006 }
ऐसी शिरकत की इस मजमे में कि,
सदियाँ बीत गयीं चराग-ए-इश्क बुझाने में,
ऐसा सैलाब उमडा तकदीर का,
कि कोई बता न सका कितनी देर लगेगी उसको आने में,
अब तो रूह तडपती है बेहिसाब, कि चैन नहीं आता।।
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{ 23-Apr-2005 }
रात बीती, चलो भुला दें।
कौन अपना और कौन पराया
यह भेद आज मैं समझ न पाया,
पलकें खा गईं धोखा न जाने कैसे आज
दिल की खामोशियों को मैं परख न पाया।
इन खामोशियों को थोडी आवाज दिला दें,
रात बीती, चलो भुला दें।
सागर की लहरों को तुम तूफान समझ सकते हो
सुन चुका मैं, अब चला, ये मेरे प्यार की पुकार है,
गरज रही हुँकार सी बादल से मत भाग मेरे मन
ये मेरे दोस्त की मेरे लिए छेडी हुई मल्हार है।
ओछे शब्दों को थोडी सी जज्बात सिखा दें,
रात बीती, चलो भुला दें।
आशिकाना माहौल है, वक्त बेमिसाल है,
सारे किताबों में लिख देंगे हम कुछ नगमें,
कुछ यादों के, कुछ प्यार की, कुछ तेरे लिये, कुछ अपने तकरार की
तेरे सदके सब हैं कुर्बान, जमाना बस इससे है सहमे।
चल, जमाने को थोडी सी औकात दिखा दें,
रात बीती, चलो भुला दें।
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{ 22-May-2004 }
I felt
just two drops of tear
striking on my mind.
My mind shouted
that the sky is leaking.
My heart
whispered slowly,
the drops never fall,
they rise from the two eyes of God.
I was thinking
perhaps the sky is the face of God,
and we often supposed
when drops fall
on our minds and souls.
Our mind overlooked the soul of the drops
and shouted
the sky is leaking.
We often couldn’t find the souls,
and the spirits, but always the faces,
and the sky, but the God.
We always laughed when God cried
and declared the sky was laughing.
We always laughed when people were weeping
since we looked on thy faces
who hiding the tears
letting us feel the drops of water
and not the tears.
We overlooked
thy souls, and thy spirits,
thy loves, and thy lives.
We felt
the two drops of water,
falling,
on our minds
not on our souls.
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{ 14-July-2004 }
It’s raining
through the clouds,
and also through some eyes.
Nature
is flourishing
the whole world,
but some still wait for the moment
when they will be
cherished
by the ones.
Alone,
away from all,
surrounded by clouds,
walking though fogs,
covered from darks,
searching for the light,
and hoping for friends.
A grand festival of life
is about to begin.
Shall thy come?
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{ 14-Dec-2003 }
कुछ सपने हैं, कुछ इरादे हैं,
कुछ चाहत है, कुछ वादे हैं।
कई सपने थे, जो चकनाचूर कर दिये गए
कई इरादे थे, जिनपर पानी फेर दिये गए
कई चाहत थे, चाहनेवाले ही छिड गए
कई वादे थे, जो अपनों के द्वारा ही तोडे गये।
कहते थे कि यहाँ ठँढी हवा बहती है
मैं गुजरा तो तूफान से सामना हुआ,
कहते थे कि यहाँ प्रेम की बारिश होती है
मौसम खराब हो गई है, अब यहाँ ओले बरसते हैं।
मैंने सुना था कि सबलोग यहाँ सीधे-सादे हैं
ऐसा क्यूँ लगता है कि सच्चाई का बोझ खुद पर लादे हैं,
मैंने पूछा कि आधे-अधूरे जीवन से क्या फायदा
आवाज आई के हम क्या करें, हम तो बस प्यादे हैं।
मल्हार की घडियों में जलधार कब आते हैं
सावन के मौसम में घर-बार भूल जाते हैं,
जीने वालों के अधिकार छिनते नजर आये
मौत से लडने वाले जिन्दगी से ही हार जाते हैं।
अब कहते हो कि वापस मुड जाओ
धरती पर रेंगते कीडों के कारवाँ में तुम भी जुड जाओ,
पर जीने वालों को कौन रोक सकेगा
वे तो फैलेंगे ही, भले ही सारा संसार सिकुड जाये।
अब सपने हैं आसमान को छेदने की, पत्थर मिले या न मिले
लहरों को चीरने की इरादें हैं, माँझी की परवाह कौन करे
खुशियों की बारिश करने की चाहत है, देखता हूँ कब तक आँसू बरसाओगे
अब मेरे वादे हीरों से मजबूत लगते हैं, तोडने वाले खुद ही टूट जायेंगे।
हम तो इंतजार करेंगे कयामत के बाद भी
जीने वाले जिन्दगी की परवाह कब करते हैं,
हम बिखर गये तो जमाना कौन बुहारेगा
अब मेरे आशियाँ में फजाओं के दरवाजे हैं।
क्योंकि, कुछ सपने हैं, कुछ इरादे हैं,
फिर, कुछ चाहत हैं, कुछ वादे हैं।
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{ 6-Oct-2003 }
युगों से कई रातों को देखता आया हूँ
पर इस रात कि बात ही कुछ और है,
इन सदियों में कितने लोगों से जुड चुका हूँ मैं
पर इस मुलाकात की बात ही कुछ और है।
कई पलछिनों को बटोर कर ये नाता बुना था
इन रिश्तों के पल जैसे छिन गये थे मुझसे,
गूँचे देखे, प्यार देखे, फूल देखे, बहार देखे
पर साथी तेरे साथ की बात ही कुछ और है।
इस रात की राह तकते हुये लोग थक से गये थे
इन राहों के राह में खुशबू की ओस बिछाई है,
इन शहरों में कितनी बारिशों में खुद को भींगा पाया है मैनें
फिर भींग रहा हूँ, पर प्रेम के इस बरसात की बात ही कुछ ही और है।
कई नजराने लुट गये, कितने फसाने जुट गये
इस पल की चाहत में जैसे कितने जमाने मिट गये,
जीवन को जनाजे समझनेवालों, जरा झाँक कर देखो
इन यादों की बारात की बात ही कुछ ही और है।
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{ 22-July-2003 }
O my luvs,
you are as changeable as the moon,
but I learned to get vanished for the one.
O my foes,
you are as straight as an arrow.
But I sought to longe for the other.
O my woes,
you are as graceful as a swan,
you taught me to find the stubborn facets of my life.
O my bliss,
you are as yielding as the wax,
and I forgot the darkness with your twinkling presence.
I cant forget thy all, thou you always lose sight of me,
coz, you let me to carry my thoughts back.
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{ 22-July-2003 }
Resolution, resolution, resolution
But why didn’t we ever bring a revolution,
why we never look like intrepid.
We begin from an imbroglio,
waxed in and now we want be finished in imbroglio.
Are we unwilling to find a way?
No,
paths are ahead of us.
The sun never stopped shining,
but our eyes have been closed.
The freesom of sky is moving around
and we can fly to the stars.
But we don’t have courage to let ourselves
in the splendid,
perpetual unkown.
We don’t know the experience of joy
that the unknown brings,
the greatest ecstacy that is swimming around.
Haa, we are waiting
to be nailed by the time before the doors
Shall the time arrive
when we have to move along the time.
And yes, it is a time to
take a chance,
a charge, a control,
not taking care of the being.
taking the cares shall
let us to enter
in nowhere….
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{ 23-July-2003 }
जिन्दगी का सफर जब लंबा लगने लगे
पैरों के नीचे काँटों का बिस्तर चुभने लगे,
सूरज की किरणें जब अग्नि बरसाएँ
और रास्ते पर जब पत्थर नहीं पर्वत अडने लगे।
तब भी मुसाफिर हार नहीं मानना
क्योंकि रुकने का मतलब जीवन को रोकना है,
जिन्दगी तुझे हारने को नहीं दी गई
राही, तुझे मुस्कुराते हुये बस चलते ही जाना है।
इस सफर में सब तेरे सहयात्री हैं
पर तुझे इनसे कोई सरोकार नहीं,
तुम्हें इनके सहारे सफर नहीं तय करना है
और जिन्दगी कभी सहयात्रियों की मोहताज नहीं।
इनमें से कुछ तुम्हें भटकायेंगे
कुछ तुझे बातों मे अटकायेंगे,
कुछ तेरे सफर को आसान भी बनायेंगे
और जब तक जीवित रहें तेरा साथ निभायेंगे।
मँजिलें पहले बनाई जाती हैं
रास्ते बाद में मिलते जायेंगे,
जिन्दगी के सफर को तुझे खुद ही तय करना है
तो ये सहयात्री तुझे मँजिल तक कैसे पहुँचायेंगे।
तू सामने की दूरी से क्यों घबराता है
पीछे कितने मील के पत्थर छोड आया है तू,
जो बैठ गए उनकी बातों को क्यों सुनता है
मुडके देख, सुनकर कितनी बार पछताया है तू।
तुझे इस सफर में रूकना नहीं
बल्कि राह पर रोते हुओं कि हँसाना है,
और तुझे इस जिन्दगी को जीते हुए,
मुसाफिर बस चलते ही जाना है।
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{ 9-July--2003 }
अपने दिल का हाल मैं किसे सुनाऊँ, मेरा कोई नहीं
हाल दुःखों का किसे बताऊँ, मेरा कोई नहीं।
मेरा दिल टुटा तो क्या हुआ, कितने दिल यहाँ टूटे होंगे,
साथ सब छोडें तो गम हो क्यों, कितने प्यार यहाँ लूटे होंगे,
तू दर्द मेरा समझेगा कैसे, मेरे लिये तू तडपेगा कैसे,
मेरी आवाज तू कैसे पहचाने, मेरा कोई नहीं।
जीवन का सफर तय करना है खुद ही, साथी क्यों ढूँढते फिरूँ,
रात को आना ही है, आएगा, दिन की बाट क्यों जोहते फिरूँ,
सूरज भी तो बढता अकेला, नदियाँ राह खोजती हैं खुद ही,
मेरा साथ कोई देगा क्यों, साथ किसी ने कभी दिया है क्या,
साये भी साथ छोडें अँधेरों में, कोई दूसरा साथ कैसे रहेगा,
मेरे दिल तू क्यों न समझे, मेरा कोई नहीं।
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{ 1-Jan-2003 }
रात्रि की चौथी पहर में,
एक ख्वाब देखा है मैनें।
जिन्दगी कि किताब में जैसे,
बुझता हुआ चिराग देखा है मैनें।
अँधेरों की बारात अपने शवाब पर थीं,
खुशियों के जनाजे का सौगात देखा है मैनें।
प्रियजनों से बिछाव का दुःख नहीं था मुझको,
दोस्तों को अब सामने से करते हुए घात देखा है मैनें।
आँखें खुलीं तो खबर मिला स्वप्न था सब,
जानकर खुशी हुई कि झूठा ख्वाब देखा है मैनें।
उमँग की किरणें सामने आलिंगन कर रहीं थीं,
चारों ओर से होते प्रेम का बरसात देखा है मैनें।
ख्वाब के बाहर रौशन है शहरे-मुहब्बत,
बीते हुये बातों का औकात देखा है मैनें।
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{ 4-Oct-2002 }
शहर से सहर तक
युगों की डगर तक
जीवन की सफर से,
दुखों की कहर तक
प्रिये,
मैनें नहीं भूली तुम्हारी याद
जबकि तुम थे बेखबर मुझसे
कदाचित् हम दूर नहीं थे तुझसे।
लेकिन प्रिये,
इस सुनहली रेत पर,
चमकती धूप में भी
नहीं आ रही तुम्हारी छाया भी।
अन्धेरे ख्वाबों में,
यादों के आईने में,
नहीं दिखती तुम्हारी काया भी।
अकेलेपन के सिलसिले खत्म नहीं होते,
बहते हुये आँसू अब जब्त नहीं होते,
मुझे नहीं है तुमसे कोई शिकायत।
किन्तु मेरे प्रिये,
मेरे जीवन की रोशनी,
हूँ मैं तुम्हारे साथ सदैव,
कंपकंपाते तुषारों के तले,
सागर किनारे शांत क्षितिज के नीचे,
रेतीली गर्म हवा में जलते हुये भी
जेठ की दुपहरी में,
पतझड के शजरों के तले।
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{ 6-July-2002 }
मैं नहीं जानता कौन है वो,
जिसके लिये मेरीं धडकनें धडक रही हैं
साँसें लेता हूँ मैं जिनके लिये,
जी रहा हूँ मैं किसके लिये,
मैं नहीं जानता कौन है वो।
सपने देखता हूँ मैं हर रोज,
पर वो मेरे स्वप्नों में नहीं आते,
उनके आगमन के लिये सदियों से तरसा रहा हूँ मैं,
जो मेरे दिल में प्यार की कलियाँ खिला दें।
यह चाँद जिसकी मधुरिमा,
पूरे सँसार में प्यार की किरणें बिखेरती हैं
सारे टूटे हुये दिलों में,
प्यार के रस घोल देतीं हैं,
मैं सोचता रहा हूँ हमेशा,
कि क्या मेरे दिल में बसी खामोशियों को
कभी कोई मीठी सी आवाज मिलेगी
सारे जहाँ से ठुकराये हुये इस दिल में
क्या कभी मिठास भरेगा?
कितना प्यार है चाँद को चाँदनी से,
सुबह को ओस से, पर्वत को झरने से,
कलियों कि खुशबू से, तितलियों को फूलों से,
रात्रि को सन्नाटे से, दिन को उजाले से,
सागर को लहरों से, नयनों को सपनों से,
क्या ऎसा प्रेम मेरे जीवन में आयेगा
और इस जीवन में फिर से जीने की चाहत बढायेगा?
यह अँधेरे की चादर जो,
मेरे जीवन के स्वप्न पर छाते जा रही है।
मैं गुमनाम चेहरों में
खामोश होकर पहचान माँग रहा हूँ,
मेरे स्वप्न बादलों के महल में खोते जा रहे हैं,
ओस सी शीतल और कोमल मेरे भावों को,
सुबह की किरणें कुचलती जा रहीं हैं।
सत्य से अटल मेरे प्रेम के लिए,
इस झूठी दुनिया में कोई जगह नहीं,
मगर यह दिल अभी भी इंतजार कर रहा है।
केंचुए सा सुप्त मेरा प्रेम,
इसे काट कर कितने भी टुकडे कर दो,
मरेगी नहीं,
हर टुकडा केंचुए सा,
जिन्दगी की साँस बनकर,
मेरे आँखों की प्यास लेकर,
पुनः विस्तृत हो जायेगा।
क्योंकि,
मैं अभी भी आशा में हूँ उसके,
मुझे अभी भी इंतजार है उसका,
पर ये भी एक सच है कि
मैं अब भी ये नहीं जानता,
कौन है वो?
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{ Oct-1999 }
ये सूनापन कैसे भरूँ
कैसे भरूँ वो सूखी हुई सरिता
ताकि सागर सूख न जाये
कैसे भरूँ वो खाली कोना दिल का
कैसे भरूँ वो टूटे हुये संबंध
जो शुरू होने से पहले खत्म हो गये।
कैसे रोकूँ वो शजरों का कटना
ताकि फिजाँ सहरा न बन जाये
कैसे रोकूँ तूफान का बहना
ताकि चरागे-इश्क बुझ न जाये
कैसे रोकूँ उन्हें जो चले जा रहे
ताकि ये मंजर मुनव्वर रहे।
ऐ खुदा, सुन ले ये इल्तजा
भर दो ये सुनापन, ये टूटे हुये संबंध,
रोक दो ये बहना तूफान का
ताकि जहनो-दिल रौशन रहे
ताकि जब आये प्यास, तो सरिता नजदीक रहे
ताकि जब दर्शन की इच्छा हो,
तो आईना पहलू में रहे।
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{ July-1999 }
आकाश के पँक्षी को देखो
वे
न बोते हैँ
न बुनते हैँ
और
न घोसलों में
जमा करते हैं
फिर भी
ईश्वर उन्हें खिलाता है।
जीवन क्या
भोजन से बढकर नहीं है?
सारी धरती तुम्हारी है
फिर
उसपे रहनेवालों में
भेद क्यों?
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{ April-1999 }
किसी भीषण
सूखे से आक्राँत
बँजर जमीन के सद्रिश्य
चटखता जा रहा है
मेरा ह्रिदय
काश
तुम घटा बनकर
मेरे जीवन मेँ आती
और
इस शुष्क ह्रिदय मेँ
यह विश्वास
पुनः जगा पाती
कि
बसंत आज भी
निहित है मुझमें ।
Comments (29)
tujhe sharm nahi aayi ye poem likhte huye…mujhe jeete ji maar daala tooone…mere hote huye bhi keh raha hai ki tera koi nahi…ye umeed na thi tujhse :((
gud one....par inspiration kaun hai is kavita ki
Very beautifully laid expressions!! Awesome!! I have no words to express my feelings here. You have touched all the pain that Indians are going through. Seems the start of another revolution the youth is gonna start and you gonna lead that buddy. Keep it up!! U leave me impressed everytime and inspire me all the more. :)
Bahut acche bandhu .. hakikat ko aahce tareeke se ujagar kiya hai aapne kalam dwara ..
बहुत सुन्दर गीत बन पडा है अभिषेक जी मैं भाव पक्ष के साथ साथ आपके शब्द चयन से प्रभावित हुआ।
“मैं तो बंजारा हूँ, ना टिका ना रुका कभी, दो पल साथ जी लो, फिर खुद चला जाउँगा। ”
It’s the best.
seems well written.
shows the zest and the spirit in you….the best trait in you that I like….keep that always…that makes u …..abhishek….jeet ka teeka
I liked your style. very few poets even in history have had the confidence to not rhyme evry para end. so really impressed..keep it up boss. :)
man u are simply great
Really a nice ‘ Prashna’, which asks the questions colse to pertinent reality. shabaash. keep writing. really nice thoughts.
waise to sari hi poem mein kuch khas hai. lekin ‘Prashn’ meri samajh mien sabse jyada aayi. agar ese hi likhta raha to hindi kavita mein bahut prashhedh hone wale ho.
beautiful…..vivid too….cud visualize everything….keep it up..
Bahut acche bhai.. Bahut Dard Hai isme … Keep going…
I don’t have a profound understanding of Hindi but I reckon this is a nice poem. Very soulful. Keep up the good work and drop by — at my web-space — sometime.
bahut acche bhai ,, bahut hi accha likha hai, sabdo ka accha proyog hai isme u rockeed bro !!!
achchi kavita hai!!! shabdo ko sahi se piroya gaya hai bhavnao ki maala me….
अभिषेक जी सुन्दर भावनात्मक रचना के लिये आपको बधायी.. यूं ही लिखते रहिये.. हम पढने के लिये आते रहेंगे.. साथ ही मेरी कविता पर आपकी टिप्पणी के लिये आपका धन्यवाद्… मैं नियमत रूप से अपने ब्लोग http://dilkadarpan.blogspot.com पर भी लिखता हूं… http://merekavimitra.blogspot.com पर मेरी रचना हर मंगलवार को प्रेषित होती है
अच्छी कविता है। हिन्दी में और भी लिखिये।
बेहद खूबसूरत लफ्सो का इस्तेमाल करके बेहद खूबसूरत कविता है आपने बनाई….और उनमें हमें सबसे ज्यादा ये पंक्तियां पसंद आयीं
जितने बड़े रिश्ते, उतनी बड़ी जंजीरें,
जितनी चौडी दोस्ती, उतनी बंद कुशादगी.
और टूटी हुई छ्त अट्टहास लगाती, याद दिलाती -
आकाश है प्रेम जो खुले कायनात में पलता है,
हवा की दीवारों और दूब की धरती में ही
सतरंगी खुशबू से नीला छ्त ढलता है.
Cheers Bhawna :)
@भावना, बहुत बहुत धन्यवाद, मुझे बहुत खुशी है की आपको यह कविता पसंद आई. आपने जिन पंक्तियों को चुना है, दरअसल उन्ही पंक्तियों ने इस कविता का ताना-बना बुना है. इसके आगे वाला अंतरा इस सफर को पूर्णविराम देता है.
बेहद खूबसूरत.…बिलकुल उस एहसास की तरह जो तुमने उन पलों में जिया होगा…i loved this one as much I love धुंद and the poem dhundh …rather more than that. :) u r amazing…
hmmm. Really nice. Keep it up. Aisa laga jaise khud kisi ke sath raat ke kohre mein ja rahe hai
I re-read this so many times as I do for dhund….but this is beyond everything man!!! so vivid…so beautiful and deep….so fresh everytime….ek dam Gulzar ishtyle …Man!! I must say u r really becoming Gulzar Part- 2…he is getting a tough competetion now ;p
nice poem buddy keep it up .. i would like to point out that using English words in between disturbs the fluency of your poems
What can I say … The particular poem made me speechless, Comment … from where I should start .. Excellent, great and wonderful .. these words are not enuf for creation like this.. I need to search for more greatest word that great for such a nice poem … keep it up !!!
bahut ki khoob surat likhet hai aap … is choti se duniya main kaha kaha madikh dubka baitha hai dundhna aasan nahi.. :)
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