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Category: Poetry

पुकार

बाबूजी हमें भोंको ना सुईया मछरिया,
बाबूजी हमें रोको न आठों पहरिया.

जनम हैं छूटे यहाँ, छूटे शहर हैं,
छूटी जईहें अब बाबुल की दुअरिया.

नज़र पड़ेगी मईया जब जब डगर पे,
नाहीं अइबो तोहे हम नजरिया.

भैया बुलईबो, बुलईबो बाबूजी तोके,
बाकी हम जानत, ना अइहें लितहरिया.

सोने की पिंजरा, जतन से भेजत हो,
हमका ना चाहीं चांदी की सिकरिया.

लईकन में मजली, जवनिया बहरात बा,
अब घीसी जईबे अंगनवा ससुरारिया.

अजगर के धोती आऊरी बादुर के टोपी,
हमरो देता तू एगो नैका चाकर चदरिया।

नईहर छोड़ाई दिए, देबो ना गारी,
काहे छिनलु तु हमरे सब अधिकारिया.

माई कहलू जईसन, नीके रहली हम,
मिलबो हो गईल अब काहे दुस्वरिया.

ससुरा अढावत रहे, सासू मारे ताना,
पियो मिलवलु तु गजबे बहुरुपिया.

कईसे बताएं इहाँ, का का होखत है,
का होइल जाके पूछिहा चौकिदारिया.

अभियो बकत बाटे, जे होई से होई,
एतना अलगे मत करs कि हो जा तु दफतरिया.

बाबूजी हमें भोंको ना सुईया मछरिया,
बाबूजी हमें रोको न आठों पहरिया.

 

Image Source : Bharat Matrimonial

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ज़िन्दगी

कितनी ग्राम ज़िन्दगी,
सारी तमाम ज़िन्दगी.

सुनी सकल पकडंडीयां,
राही का नाम ज़िन्दगी.

निकला था जोश में सुबह,
काटे है शाम ज़िन्दगी.

करता रहा सब बेसबब,
दर्द-ओ-हराम ज़िन्दगी.

जागे हैं फिर से धुंध में,
कैसी बदगुमान ज़िन्दगी.

तोडा है प्याला फिर करे,
साकी आराम ज़िन्दगी.

बची खुची जो भी मिली,
बेचीं सरे-आम ज़िन्दगी.

कैसे करूँ समझा मुझे,
अब एहतेराम ज़िन्दगी.

 

Image Source : La Vida

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दर्शन

गंगा थेम्स किनारे देखे,
जरमन फ्रांस बुखारे देखे.
आसमान के तारे देखे,
शीशे पार सितारे देखे.
महल बुर्ज दरबारे देखे,
सारे चौक चौबारे देखे.
डॉलर येन फेरारे देखे,
चहूँ वोर तुने प्यारे देखे.
सरगम देखी, नारे देखे,
दोनों ओर बहारें देखे.

घर देखा, बाहर भी देखा,
क्या-क्या बोल नज़ारे देखे?
जीतें देखीं, जश्न मनाई,
कौन-कौन थे हारे, देखे?
कायर देखे, जौहर देखे,
किस-किस ने तुम्हारे देखे?
देखी सागर पे परछाई,
क्या खुद के कभी इशारे देखे?
खुद को अंदर देख बता,
क्या-क्या, है क्या-क्या रे देखे?

 

Image Source : Doctor Hugo

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बयालीस

Being alive is a pre-existing condition.

घुमक्कड हो फक्कड,
जहाजी मदारी,
कहीं तो कदम कर,
यही दुनिया सारी.

क्षितिज के इशारे,
जमीं की किनारी,
नज़र बे-नज़र
दबी होशियारी.

सवालों की चोटी,
उलझन है सारी,
नादान मष्तिष्क
भरे है बीमारी.

नहीं देखना कुछ,
न मुनासिब तैयारी,
करम बा-खुदा
गुमशुदगी में हारी.

पैरों के तूफान ने
कुचले दरख़्त सारी,
फिर भी ये उन्मुक्त,
शफ्फाक बलिहारी.

भटकती तडपती
खोजती है तू क्या री,
रास्ता क्या, क्या मंजिल,
पता भी है क्या री.

उजड गए मंज़र,
बनी तू भिखारी,
लरजती गरजती
क्या जीती क्या हारी.

यहाँ से वहाँ तक
हवा जो है सारी,
जहाँ से जहाँ तक
बयालीस की मारी.

बयालीस तुम्हारी,
बयालीस हमारी,
बयालीस बयालीस,
बयालीस है सारी.

An ode to 42 The Answer to the Ultimate Question of Life, the Universe, and Everything
(From The Hitchhiker’s Guide to the Galaxy by Scott Adams)

Image courtesy - Derek Corneau

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धर्मकाँटा

 

राजा मेरा गज़ब का, किये थे अद्भुत काम
सागर लंका धाँस दी, पाप मिटाता नाम.

उस दिन तेरे देश भये सुखी सभी सुबः शाम
न्याय, सत्य, और प्रेम ने किये कुशल व्यायाम.

याद बिसारी तुने तब, जब पड़ी तेज है घाम
लेकर तेरा नाम यहाँ मच रखी घोर संग्राम.

नज़र बिराजे रामचन्द्र, अधर निहारे दाम
आयुध तानी फैज़ पे, और किया घोर बदनाम.

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एहसास

‘इस धुँध की महक
कितनी सोंधी होती है ना!’
उस रात घने कोहरे में
साथ चलते-चलते तुमने कहा था.
स्ट्रीटलाईट की पीली रौशनी में,
तुमने मेरे कंधे पे हाथ रखकर जोर की एक साँस ली थी
और तुम्हारा चेहरा चमक गया था.
तुम्हारे बदन की तपिश
और किनारे खड़े लिप्टस की पत्तियों से
गिरते हुए ओस में
एक सोंधी सी,
भीनी-भीनी खुशबू का मुझे भी एहसास हुआ था.
मैंने जब तुम्हारी और देखा
तो शायद तुमने कहा था
‘मुझे तो इसी धुँध में अपनी ज़िंदगी गुजारनी है’
उस वक़्त मेरा ध्यान
तुम्हारे सिर के ऊपर से झाँक रहे चाँद की तरफ़ था.
वो चाँद तो मुझे अब याद नहीं
पर उस दिन से आज तक
मैं उसी धुँध में जी रहा हूँ.

याद है, जब मैं तुम्हे शिफौन पहनने को कहा करता था,
तुम शरमा के लाल हो जाती
और चुपके से हँसते हुए,
मेरे कंधे पर चेहरा छुपाकर मेरा गरदन चूम लेती थी.
आज जब भी मुझे
आलमीरे में वो शिफौन नज़र आता है,
मेरे कंधे पे एक आहट होती है
और वही, उस रात वाली,
सोंधी सी महक.
पीछे मुड़कर देखता हूँ तो कुछ भी नज़र नहीं आता.
वो कोहरा आज भी
मेरे गिर्द
ज़र्द होकर पड़ा है.

एक दिन तुमने
पागलों की तरह मुझे खींच कर
अपने जिस्म के आलिंगन में बाँध लिया था.
याद है, उस दिन
मेरे हाथों को अपने बदन से लिपटा पाकर
तुम्हारा जिस्म थर-थर काँपने लगा था,
मेरे पीठ सहलाने पर तुम तो धीरे-धीरे शांत हो गई थी,
लेकिन मेरा अस्तित्व
आज तक वैसे ही काँप रहा है,
वो तूफान कभी थमने का नाम ही नहीं लेता.
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने अपने स्वेटर को तेरी खुशबू से लबरेज़ पाया था,
वो मेरे आलमीरे में अब तक पड़ा है.

इस शहर में अब धुँध नहीं होती,
सिर्फ़ धुआँ दिखता है.
आज जब भी अपने होंठों पे हाथ फिराता हूँ,
तुम्हारा एहसास वहीं का वहीं पाता हूँ
और आईने में ख़ुद को हिलता नज़र आता हूँ.
रोज़ रात को जब तुम्हारी याद आती है,
मैं उठकर आलमीरा खोल देता हूँ,
जिस तरह मैं तुम्हारे लिए अपने घर का दरवाजा खोला करता था,
वो सोंधी से महक अब भी वहीं लेटी है.
और वो कुहरा,
मेरे बिस्तर में रात भर पैर समेटे सोता रहता है.

Image source: Anna Dann

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गृहप्रवेश

रिश्तों की तकसीम से
बनी दीवारों से आहत
इक शख्स ने टोका यूँ हीं.
मैं तीरगी में कुछ ढूँढ रहा था,
और कुछ शिकायत थी उनको,
वो अटक रहे थे,
मैं भटक रहा था.

उनकी पेशवा आंखें,
ठहरी बदहवास साँसे,
क्षुब्ध चेहरे से कुछ लम्हें धीरे से खाँसें –
क्या खोजते हो इस जहाँ में,
बिना छ्त के इस मकाँ में?

बुने थे कुछ चेहरे, चुने थे कुछ रिश्ते,
फ़िर फरिश्तों की ईंट से था घर इक बनाया.
चेहरे मुँह बाये खड़े रहे,
दीवार छ्त को खा गए,
आंखें स्तब्ध, ज़ुबाँ खामोश, न जाने कैसे ये मंजर आया.

मेरे लफ़्ज़ों से फूटे
चंद जुम्ले मुतबस्सुम-
बहते बादलों से जन्मे
एक बूँद ही हैं हम तुम.
सावन, आषाढ़, या सर्दी की हो लहरें,
झील, झरने, या नदी में हम ठहरें,
तेरे टूटे हुए छ्त या टपकें हरे दूब पे,
मुख्तलिफ परिभाषाएं, पर बूँद ही हैं हम तुम.

मिटटी के घर की छतों से बने शहरें,
या हो फ़िर देशों की सीमाओं पे पहरें,
घर की कमरों में क़ैद हवा
या तो सड़ जायेगी
या फ़िर छ्त तोडके उड़ जायेगी.
मुख्तलिफ रिश्ते, दोस्ती, नाते, वास्ते,
अलग-अलग कमरों जैसे
छ्त खोजते हुए दीवारों से जकडे राब्ते.

जितने बड़े रिश्ते, उतनी बड़ी जंजीरें,
जितनी चौडी दोस्ती, उतनी बंद कुशादगी.
और टूटी हुई छ्त
अट्टहास लगाती, याद दिलाती –
आकाश है प्रेम
जो खुले कायनात में पलता है,
हवा की दीवारों
और दूब की धरती में ही
सतरंगी खुशबू से नीला छ्त ढलता है.

तेरे बनाये घर से दबी है कायनात
सिसकती सदायें और बिखरे हयात,
बिला खौफो-खतर ये सफर छोड़ दो
बिना छ्त की बनी हर घर तोड़ दो,
खोज सच की है तो आओ दरवेश चलें
चरगे-इश्क दिल में जला गृहप्रवेश करें.

शब्दकोश:
तकसीम – बंटवारा,
तीरगी – अँधेरा,
पेशवा – ज्ञानी,
मंजर – दृश्य,
मुतबस्सुम – मुस्कुराते हुए,
मुख्तलिफ – भिन्न-भिन्न, तरह तरह के,
कुशादगी – खुलापन,
कायनात – 
संसार,
सदायें – आवाजें,
हयात – जीवन,
बिला खौफो-खतर – भय और दुःख के बिना,
दरवेश – पवित्र-स्थल.

Image source: Ken Lauher

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