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पलछिन

युगों से कई रातों को देखता आया हूँ
पर इस रात कि बात ही कुछ और है,
इन सदियों में कितने लोगों से जुड चुका हूँ मैं
पर इस मुलाकात की बात ही कुछ और है।

कई पलछिनों को बटोर कर ये नाता बुना था
इन रिश्तों के पल जैसे छिन गये थे मुझसे,
गूँचे देखे, प्यार देखे, फूल देखे, बहार देखे
पर साथी तेरे साथ की बात ही कुछ और है।

इस रात की राह तकते हुये लोग थक से गये थे
इन राहों के राह में खुशबू की ओस बिछाई है,
इन शहरों में कितनी बारिशों में खुद को भींगा पाया है मैनें
फिर भींग रहा हूँ, पर प्रेम के इस बरसात की बात ही कुछ ही और है।

कई नजराने लुट गये, कितने फसाने जुट गये
इस पल की चाहत में जैसे कितने जमाने मिट गये,
जीवन को जनाजे समझनेवालों, जरा झाँक कर देखो
इन यादों की बारात की बात ही कुछ ही और है।

Published in Poetry

One Comment

  1. gud one….par inspiration kaun hai is kavita ki

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